सुनते हैं कि 2047 भी होगा…

//सुनते हैं कि 2047 भी होगा…

सुनते हैं कि 2047 भी होगा…

written on 17 September 2018

सुनते हैं कि 2047 भी होगा…
धर्म जिसका सम्बन्ध आस्था या अध्यात्म से है यदि आपको लगता है कि उस धर्म के कारण, उस धर्म के लिए या सिर्फ उस धर्म के आधार पर 1947 का बंटवारा हुआ था तो आप प्रसिद्ध इतिहासकार रामचन्द्र गुहा के इस लेख को और विशेषकर अंतिम कुछ पंक्तियों को ठीक से पढ़ लीजिए।

मैं अभी भी बंटवारे के वास्तविक वजहों, कारकों, अदृश्य तत्वों, किरदारों को लेकर किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा हूं, इतिहास की किताबें मुझे अब तक इस हेतु संतुष्ट नहीं कर पाई हैं लेकिन इतना तो मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि बंटवारा का धर्म से कभी कोई लेना-देना नहीं था। उस धर्म से जो वास्तव में धर्म है। वह धर्म जिसकी आवश्यकता मानव सभ्यता के विकास के साथ स्वाभाविक रूप से महसूस हुई और उत्तरोत्तर उसका विकास, विस्तार, विन्यास होता गया।

मुझे इस बात में भी तनिक भी शंका नहीं कि दुनिया का कोई भी धर्म और कोई भी सच्चे अर्थो में धार्मिक व्यक्ति पूरी पीढ़ी को, पूरे भविष्य को बंटवारे जैसे विध्वंस के तरफ धकेलने की बात सोच भी नहीं सकता। धर्म तो शीतलता का दूसरा नाम है, मन, कर्म, वचन, आत्मा की शीतलता, उसका बंटवारे जैसे आग से क्या वास्ता।

विध्वंस अपने लिए जरिया ढूंढ लेता है, कभी भूकम्प के रूप में तो कभी सुनामी के रूप में, कभी आग से तो कभी हवा से। उसे सिर्फ एक जरिया चाहिए होता है, जिससे वह सबकुछ तहस-नहस कर सके।
उसी तरह एक मानव को दुसरे मानव से अलग, कमतर या मानव ही न समझने जैसा विघटनकारी सोच भी अपने लिए विध्वंसकारी जरिया ढूंढ लेती है, नफरत की भाषा गढ़ लेती है और जन्मगत मनुष्यता को नष्ट कर पूरी पीढ़ी को, पूरे भविष्य को बंटवारे जैसे विध्वंस के तरफ धकेल देती है।
पूरा विश्व इतिहास ऐसे असंख्य उदाहरणों से भरा पड़ा है। यह जरिया कहीं रंग के रूप में है तो कहीं नस्ल के रूप में, कहीं जाति के रूप में है तो कहीं धर्म के रूप में। मानव समाज जब तक इस मूल जहर के प्रति खुद को सचेत नहीं करेगा तब तक हिटलर भी होंगे और जिन्ना भी होंगे, 1984 भी होगा और 2002 भी होगा। 1947 भी होगा और अब तो सुनते हैं कि वैसा ही 2047 भी होगा।

यदि कोई यह समझ रहा कि हिटलर न होते तो विश्वयुद्ध न होता, जिन्ना न होते तो बंटवारा न होता, कांग्रेस न होती तो 1984 न होता, भाजपा न होती तो 2002 न होता तो मेरी समझ से वह बिल्कुल गलत सोच रहा है, वह बिल्कुल गलत निष्कर्ष पर है।
जो जहर हवा में घुला है, हमारी नसों में दौड़ रहा है तो जो ये न होते तो इनकी जगह कोई और ही होता, पर देर-सबेर यह होता ही। दरअसल ऐसा सोचना, एक व्यक्ति या संस्था को जिम्मेवार मान लेना, सिर्फ परिणाम को ही दोषी मान लेना है, मूल कारण व कारक से पूरी तरह मुंह फेर लेना है और यह सोच भी कम घातक नहीं है क्योंकि ऐसा सोचने से ही हमारी पूरी उर्जा सिर्फ परिणाम पर ही केन्द्रित रह जाती है।
नरसंहार, बंटवारा जैसे विध्वंस का कारण व कारक सिर्फ एक व्यक्ति या संस्था ही हो यह सम्भव नहीं है। दरअसल मानव जाति, सम्पूर्ण समाज को खुद के भीतर झांकने की आवश्यकता है, अपने आस-पास निहारने की आवश्यकता है।
यह देखना होगा कि कहीं कोई मानवता विरोधी सोच जैसा जहर, कोई पूर्वाग्रह हमारे भीतर तो नहीं छुपा है, देखना होगा कि हमारे आस-पास, हमारे अपने इस बीमारी के तो शिकार नहीं हो चुके हैं, जो यह बीमारी हमारे अंदर है या हमारे आस-पास है तो सबसे पहले हमें उसे दूर करनी होगी। और यह बिल्कुल भी दुरूह नहीं है, हम सोच लें, आप सोंच लें तो यह अभी इसी वक्त होने लगेगा और बहुत जल्दी अपना विस्तार पा लेगा। जब यह होगा तो राजनीतिक पसंद, विचारधारा, चयन सभी स्वतः ही प्रभावित होने लगेंगे।

याद रखिये राजनेता और राजनीतिक दल किसी दुसरे ग्रह के प्राणी नहीं हैं, वे हमारे बीच के ही हैं, उन्हें यदि सिर्फ सत्ता ही चाहिए और इसलिए वे उपरोक्त जहर का प्रयोग करते हैं, तो वे ऐसा कर पाते हैं क्योंकि वह जहर हमारे अंदर, हमारे बीच पहले से मौजूद है।
जो यह जहर नहीं होगी तो ये राजनीतिक जमात भी अपनी सत्ता के लिए, प्रभाव व प्रसार के लिए कोई और ही बाजिव जरिया ढूंढने को मजबूर होंगे।
जरूरत है मानवतावादी सोच के प्रसार की, जरूरत है विध्वंसकारी सोच और तत्वों के दुष्परिणाम से वर्तमान पीढ़ी को आगाह करते रहने की।
जर्मनी के सड़कों पर घूम आइये, हिटलर के चिह्न आपको जगह-जगह दिख जाएंगे I हिटलर से नफरत में जर्मनी ने उसके इतिहास को मिटाया नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था की कि आने वाली पीढ़ी उसके कुकृत्यों के दुष्परिणामों को अच्छी तरह समझ सके, समझते रहे, और फिर कभी वैसे किसी जहरीली आग में फंसने से बच सके, बचती रहे I
पीढ़ियों को आगाह करते रहने की जिम्मेवारी हमलोगों की ही तो है I जो यह होता, ऐसा होता, तो न 1947 होता न फिर कभी उस सा 2047 ही होगा।

By |2019-01-10T16:40:00+00:00January 10th, 2019|Messages|0 Comments

About the Author:

Leave A Comment